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दाग़ देहलवी की शायरी

इनके बारे में

बुलबुल-ए-हिंद, फ़सीह-उल-मुल्क नवाब मिर्ज़ा दाग़ वो महान शायर हैं जिन्होंने उर्दू ग़ज़ल को उसकी निराशा से निकाल कर, मुहब्बत के वो तराने गाए जो उर्दू ग़ज़ल के लिए अलहदा थे। उनसे पहले ग़ज़ल विरह की तड़प से या फिर कल्पना की बेलगाम उड़ानों से लिखी जाती थी। दाग़ ने उर्दू ग़ज़ल को एक शगुफ़्ता और रजाई लहजा दिया और साथ ही उसे बोझिल फ़ारसी संयोजनों से बाहर निकाल के क़िला-ए-मुअल्ला की ख़ालिस टकसाली उर्दू में शायरी की जिसकी दाग़-बेल ख़ुद दाग़ के उस्ताद शेख़ इब्राहीम ज़ौक़ रख गए थे। नई शैली सारे हिंदुस्तान में इतनी लोकप्रिय हुई कि हज़ारों लोगों ने उसकी पैरवी की और उनके शागिर्द बन गए। ज़बान को उसकी मौजूदा शक्ल में हम तक पहुंचाने का श्रेय भी दाग़ के सर है। दाग़ ऐसे शायर और फ़नकार हैं जो अपने चिंतन-दर्शन, शे’र-ओ-सुख़न और ज़बान-ओ-अदब की ऐतिहासिक सेवाओं की वजह से सभी के दिलों पे सदा राज करेंगे।❤❤❤

शेर ( शायरियां )

तुम्हारा दिल मिरे दिल के बराबर हो नहीं सकता
वो शीशा हो नहीं सकता ये पत्थर हो नहीं सकता

हज़ारों काम मोहब्बत में हैं मज़े के ‘दाग़’
जो लोग कुछ नहीं करते कमाल करते हैं .

वफ़ा करेंगे निबाहेंगे बात मानेंगे
तुम्हें भी याद है कुछ ये कलाम किस का था

दिल दे तो इस मिज़ाज का परवरदिगार दे
जो रंज की घड़ी भी ख़ुशी से गुज़ार दे

मिलाते हो उसी को ख़ाक में जो दिल से मिलता है
मिरी जाँ चाहने वाला बड़ी मुश्किल से मिलता है

आइना देख के कहते हैं सँवरने वाले
आज बे-मौत मरेंगे मिरे मरने वाले.

ख़बर सुन कर मिरे मरने की वो बोले रक़ीबों से
ख़ुदा बख़्शे बहुत सी ख़ूबियाँ थीं मरने वाले में

इस नहीं का कोई इलाज नहीं
रोज़ कहते हैं आप आज नहीं

हमें है शौक़ कि बे-पर्दा तुम को देखेंगे
तुम्हें है शर्म तो आँखों पे हाथ धर लेना

आशिक़ी से मिलेगा ऐ ज़ाहिद
बंदगी से ख़ुदा नहीं मिलता

सब लोग जिधर वो हैं उधर देख रहे हैं
हम देखने वालों की नज़र देख रहे हैं

आप का ए’तिबार कौन करे
रोज़ का इंतिज़ार कौन करे

ग़ज़ब किया तिरे वअ’दे पे ए’तिबार किया
तमाम रात क़यामत का इंतिज़ार किया

शब-ए-विसाल है गुल कर दो इन चराग़ों को
ख़ुशी की बज़्म में क्या काम जलने वालों का

लिपट जाते हैं वो बिजली के डर से
इलाही ये घटा दो दिन तो बरसे

ख़ूब पर्दा है कि चिलमन से लगे बैठे हैं
साफ़ छुपते भी नहीं सामने आते भी नहीं

बात तक करनी न आती थी तुम्हें
ये हमारे सामने की बात है

बड़ा मज़ा हो जो महशर में हम करें शिकवा
वो मिन्नतों से कहें चुप रहो ख़ुदा के लिए

ले चला जान मिरी रूठ के जाना तेरा
ऐसे आने से तो बेहतर था न आना तेरा

लुत्फ़-ए-मय तुझ से क्या कहूँ ज़ाहिद
हाए कम-बख़्त तू ने पी ही नहीं

साक़िया तिश्नगी की ताब नहीं
ज़हर दे दे अगर शराब नहीं

जिन को अपनी ख़बर नहीं अब तक
वो मिरे दिल का राज़ क्या जानें

कहने देती नहीं कुछ मुँह से मोहब्बत मेरी
लब पे रह जाती है आ आ के शिकायत मेरी

अर्ज़-ए-अहवाल को गिला समझे
क्या कहा मैं ने आप क्या समझे

ज़िद हर इक बात पर नहीं अच्छी
दोस्त की दोस्त मान लेते हैं

ये तो कहिए इस ख़ता की क्या सज़ा
मैं जो कह दूँ आप पर मरता हूँ मैं

उर्दू है जिस का नाम हमीं जानते हैं ‘दाग़’
हिन्दोस्ताँ में धूम हमारी ज़बाँ की है

जिस में लाखों बरस की हूरें हों
ऐसी जन्नत को क्या करे कोई

ये तो नहीं कि तुम सा जहाँ में हसीं नहीं
इस दिल को क्या करूँ ये बहलता कहीं नहीं

यूँ भी हज़ारों लाखों में तुम इंतिख़ाब हो
पूरा करो सवाल तो फिर ला-जवाब हो

दी मुअज़्ज़िन ने शब-ए-वस्ल अज़ाँ पिछले पहर
हाए कम्बख़्त को किस वक़्त ख़ुदा याद आया

आओ मिल जाओ कि ये वक़्त न पाओगे कभी
मैं भी हम-राह ज़माने के बदल जाऊँगा

रहा न दिल में वो बेदर्द और दर्द रहा
मुक़ीम कौन हुआ है मक़ाम किस का था

उड़ गई यूँ वफ़ा ज़माने से
कभी गोया किसी में थी ही नहीं

तुम को चाहा तो ख़ता क्या है बता दो मुझ को
दूसरा कोई तो अपना सा दिखा दो मुझ को

हज़ार बार जो माँगा करो तो क्या हासिल
दुआ वही है जो दिल से कभी निकलती है

ना-उमीदी बढ़ गई है इस क़दर
आरज़ू की आरज़ू होने लगी

हाथ रख कर जो वो पूछे दिल-ए-बेताब का हाल
हो भी आराम तो कह दूँ मुझे आराम नहीं

हज़रत-ए-दाग़ जहाँ बैठ गए बैठ गए
और होंगे तिरी महफ़िल से उभरने वाले

ख़ातिर से या लिहाज़ से मैं मान तो गया
झूटी क़सम से आप का ईमान तो गया

रुख़-ए-रौशन के आगे शम्अ रख कर वो ये कहते हैं
उधर जाता है देखें या इधर परवाना आता है

कल तक तो आश्ना थे मगर आज ग़ैर हो
दो दिन में ये मिज़ाज है आगे की ख़ैर हो

कोई नाम-ओ-निशाँ पूछे तो ऐ क़ासिद बता देना
तख़ल्लुस ‘दाग़’ है वो आशिक़ों के दिल में रहते हैं

ये सैर है कि दुपट्टा उड़ा रही है हवा
छुपाते हैं जो वो सीना कमर नहीं छुपती

साथ शोख़ी के कुछ हिजाब भी है
इस अदा का कहीं जवाब भी है

नहीं खेल ऐ ‘दाग़’ यारों से कह दो
कि आती है उर्दू ज़बाँ आते आते

मुझे याद करने से ये मुद्दआ था
निकल जाए दम हिचकियाँ आते आते

Happy Women’s Day

स्त्री जन्म नहीं लेती बल्कि बनाई जाती है।
समाज,परंपराएं,धर्म शास्त्र सभी मिलकर स्त्री को बनाते हैं,
और स्त्री का बुनियादी संघर्ष भी यही से शुरू होता है। समाज द्वारा उन पर प्रश्न उठाकर,ये वहीं मान्यताएं जो स्त्री को अपने निर्णय का अधिकार नहीं देती खैर!
महिला दिवस की शुभकामनाएं !

स्त्री जो अपना जीवन सदैव अपनों के लिए निछावर कर देती है।
स्वयं के हित का बाद में, पहले अपनों का हित देखती है, अपने परिवार…अपने चाहने वालों के लिए सभी हद पार कर देती है…हम पुरुष जिस पर अपना प्रभुत्व दिखा कर महान बनने की कोशिश करते है… और बाद में थक हार कर उसी की बाहों में सांस या उसी के आँचल में नींद लेते है… उस नारी को महिला दिवस की शुभकामनाएं.