वो बदनाम सी लड़की पार्ट – 2

वो बदनाम सी लड़की पार्ट – 1👇

वो बदनाम सी लड़की ( Part 1 )

Aage ki kahani – part – 2 👇

एक साल दस महीने गुजर चुके थे संध्या को आखिरी बार देखे हुए। इंटरमीडिएट की परीक्षा में केवल दो महीने बचे थे… और स्कूल जाना बंद कर दिया था मैंने। सुबह नौ बजे तक सोना और फिर शाम साढ़े तीन बजे कोचिंग पढ़ने के लिए निकल जाना, फिजिक्स, कंप्यूटर, केमिस्ट्री और सबसे आखिरी में मैथमेटिक्स पढ़ने के बाद घर आकर टीवी पर स्टार वन पर फेवरेट सीरियल “दिल मिल गए” देखना रोज का नियम था। कभी कभी पापा जल्दी घर आ जाते थे तो बिना टीवी देखे ही पढ़ाई शुरू करनी पड़ती थी। चार कोचिंग एक साथ पढ़ना मुझे मुश्किल लगता था लेकिन सुबह सुबह रजाई से निकलना उससे भी ज्यादा तकलीफदेह था। इसलिए मैंने सुबह का बैच नहीं चुना किसी भी कोचिंग का। शाम चार बजे मैं फिजिक्स की कोचिंग में पहुंचा तो भीड़ बहुत ज्यादा थी। अपने पास बैठे एक अजनबी लडके से पता चला कि सुबह पढ़ने वाले लोग भी आज शाम को ही पढ़ने आए हैं। सर ( अध्यापक ) सवाल पूछते थे और बाकी सब एक साथ जवाब दे रहे थे। इसी बीच एक सवाल ऐसा आया जिसका जवाब कोई नहीं दे पाया, केवल एक लड़की ने दिया। उसकी आवाज ने मुझे कुछ पुराना याद दिलाया। मैंने भीड़ में से वो चेहरा तलाशना शुरू कर दिया। और मुझे वो दिख गई। वो सन्ध्या ही थी। पहले जितनी दुबली पतली सामान्य लड़की नहीं लग रही थी वो। अब तो वो बहुत ही खूबसूरत लड़की लग रही थी। क्या उसने मुझे अभी तक देखा नहीं। मैं किसी भी तरह उसका ध्यान अपनी तरफ खींचना चाहता था। बहुत सोचने के बाद मैंने दिमाग लगाया और अपने दोस्त का मोबाइल लेकर अपने मोबाइल पर कॉल किया। जैसे ही रिंगटोन बजी सबका ध्यान मेरी तरफ गया। संध्या ने भी मेरी तरफ देखा। मैंने एकदम से ऐसे दिखावा किया जैसे मुझे पता ही नहीं फोन किसने किया। मैंने जल्दी से फोन ऑफ किया और फिर संध्या की तरफ देखा। मेरी योजना कामयाब हो गई थी, संध्या मेरी तरफ देख कर दंग रह गई थी। उस शायद उम्मीद नहीं थी कि मैं उसके सामने एक बार फिर अा जाऊंगा। और उस पल के बाद उसने मेरी तरफ नहीं देखा। पूरे एक घंटे में एक बार भी नहीं। मैं अपने आप से पूछ रहा था,” क्या ये वही संध्या है? ये इतना कैसे बदल गई कि मुझे देख ही नहीं रही। क्या वक्त के साथ अाई खूबसूरती ने इसका घमंड बढ़ा दिया है।” तीन दिन तक उसकी क्लास मेरे साथ हुई और तीन दिनों में उसने कुल तीन बार भी मेरी तरफ नहीं देखा। और चौथे दिन से फिर दोनों बैच अलग अलग हो गए। वो सुबह पढ़ने आती थी और मैं शाम को। वो कोकीन के नशे की तरह हो गई थी, इतने अरसे बाद तीन दिन के लिए अाई और मुझे अपनी लत लगा के चली गई। कोई अचानक से नजरअंदाज कर दे तो बुरा तो लगता है मगर इतना बुरा? मैं भी बेचैन होकर आखिर पहुंच गया गुरुवर से इजाजत लेने उसके साथ पढ़ने की। मैंने बहाना बनाया कि मेरी कंप्यूटर क्लास का टाइम टेबल बदल रहा है मुझे सुबह वाले बैच में आने की अनुमति दी जाए। जो काम मेरे लिए सबसे मुश्किल हुआ करता था आज आसान हो गया था, मैं सुबह छः बजे सोकर उठा। सात बजे सड़क पर हल्का सा कोहरा हल्की सी धूप सुबह सुबह की दुनियां थोड़ी अलग ही दिख रही थी। पार्किंग में साइकिलों की संख्या शाम की तुलना में बहुत ज्यादा थी। पता नहीं क्यों लोगों को सुबह सुबह पढ़ने का मन होता है। ऐसे मौसम में रजाई और गर्म बिस्तर इन सब लोगों को आवाज नहीं देता क्या? चलो मैं तो दिल के हाथों मजबूर हूं, इनकी क्या मजबूरी है जो शाम की बजाय सुबह सुबह चले आते हैं? जो भी हो मैं सुबह सुबह पहुंच गया और नजारा काफी अच्छा था। लडके लडकियां अलग अलग नहीं एक साथ बैठे थे। कितने समझदार हैं ये लोग, वरना शाम को तो लड़कियां एक साथ आगे और लड़के पीछे बैठते हैं। मैं थोड़ा देर से आया था इसलिए सबसे पीछे बैठना पड़ा। लेकिन अच्छा था कि पीछे से सब लोग दिखाई डी रहे थे। संध्या अभी भी नजर नहीं आई मुझे लगा शायद बिल्कुल आगे बैठी हुई होगी जिनके चेहरे मुझे नहीं दिख रहे। मगर कुछ देर बाद संध्या दरवाजे से अंदर अाई। मैं खुश होने की बजाय घबरा गया। क्योंकि अब वो मेरे पास आकर बैठने वाली थी। उसने मुझ पर ध्यान नहीं दिया और मेरे पास आकर बैठ गई। पहली बार वो मेरे इतने करीब थी कि उसके बालों में लगे शैंपू की खुशबू से मैं शैंपू के ब्रांड का नाम भी बता सकता था। मगर उसको एहसास नहीं था कि वो मेरे इतने करीब आ गई है। उसने अपनी किताबें और नोटबुक निकाल कर जल्दी से मेरी नोटबुक में झांकने की कोशिश की और देखने लगी कि देर से आने पर उसको कितना नुकसान हुआ है। लेकिन मेरी लिखावट पढ़ना हर किसी के बस की बात कहां थी। इसलिए उसने मुझसे पूछना चाहा, और पूछने के लिए उसने मेरी तरफ देखा, तो उसके शब्द उसके गले में ही रुक गए। उसकी निगाहें भले ही मेरी तरफ आने में कतरा रही थी मगर उसका दिल मेरी तरफ आने में बिल्कुल देर नहीं लगा रहा था। वैसे देखा जाए तो हमने आज तक एक दूसरे से कुछ भी नहीं बोला था, एक शब्द भी नहीं। वो समझ गई थी कि मैं सुबह उसकी वजह से आया हूं। मैं जानना चाहता था कि क्या हुआ ऐसा जो वो मेरी तरफ देखना नहीं चाहती। मैंने धीरे धीरे सुबह जल्दी उठने की आदत डाल ली। लेकिन जल्दी मेरे हिसाब से होता था कोचिंग के हिसाब से मैं पांच दस मिनट देर से ही जाता था। और संध्या भी मेरे आने के बाद ही आती थी। शायद ही किसी दिन वो मुझसे पहले अाई हो। एक दिन मुझे उस सवाल का जवाब मिला। मैंने कोचिंग में कुछ लड़कों के मुंह से सुना,” संध्या का बॉयफ्रेंड है कोई, सुना है जीआईसी में पढ़ता है।” मैंने सोचा मेरे स्कूल का कोई लड़का संध्या का बॉयफ्रेंड है और मुझे पता नहीं चला। शायद इसीलिए वो मुझसे दूर दूर सी हो रही है। मैंने उन लड़कों से संध्या के बॉयफ्रेंड का नाम पूछा। और जवाब में नाम आया,” विवेक”। सुनते ही मैंने कहा,” क्या बे… मतलब कुछ भी बोलते हो तुम यार, मैं ही वो विवेक हूं और हमारा कुछ नहीं है चक्कर।” उनको संक्षेप में कहानी बताई मैंने। और फिर वो दिन आया जब हमने पहली बार एक दूसरे से बात की। मैंने पार्किंग में देखा एक भी साइकिल या मोटरसाइकिल नहीं खड़ी थी। मैंने अपनी साईकिल पार्किंग में लगाई और कोचिंग वाले कमरे की तरफ गया। कमरे में गुरुदेव की श्रीमती जी बैठी चाय पी रही थी और बच्चे खेल रहे थे। उन्होंने मुझे देखते ही कहा,” बेटा आज छुट्टी है, आपके सर किसी काम बाहर गए हैं। आप कल आना।”
मुझे सुनकर बहुत गुस्सा आया। अगर उन्होंने एक दिन पहले बता दिया होता तो आज इतने दिन बाद कम से कम गरम रजाई में देर तक सोने को मिलता। मैं वापस अपनी साइकिल के पास आया था कि तब तक पार्किंग में संध्या भी अाई। हम दोनों अकेले थे… और उसने आसपास देखा फिर मेरी तरफ देखा। मैंने सोचा आज सही मौका है जब कोई हमें नहीं देख रहा। आज मैं दिल की बात कहूंगा। लेकिन क्या कहूं? कहां से शुरू करूं दो साल पहले से या तीन साल पहले से? मैं इन्हीं सवालों में उलझा रहा तब तक उसने मुझसे कुछ पूछा।
” आज छुट्टी है क्या?” उसके ये शब्द पहले शब्द थे जो उसने मुझे कहे। दिल में खुशी और उत्साह का तूफान उठा जिसे उसके सामने जाहिर ना करते हुए मैंने कहा,” हां, सर किसी काम से बाहर गए हैं।”
उसने पूछा,” कब तक अयेगें?”
मैंने कहा,” भाभी (अध्यापक जी की पत्नी) ने बोला कल आना।”
” अच्छा … ठीक है…… बाय।” कहकर उसने अपनी साइकिल वापस घुमाई और जाने लगी। मैंने भी अपनी साइकिल उसके पीछे लगाई और बिना कुछ कहे कुछ देर उसके साथ साथ चलता रहा। फिर वो अपने रास्ते मुड गई। अगले दिन मैंने फिर से पार्किंग में वही नजारा देखा। फिर से मैं और संध्या दो लोग ही पार्किंग में खड़े थे। फर्क इतना था कि आज मेरी जगह वो थी और उसकी जगह मैं। आज वो थोड़ा जल्दी अा गई थी। मैंने उसका कल वाला सवाल आज दोहराया।
“आज छुट्टी है क्या?”
” हां सर किसी काम से बाहर गए हैं।” उसने कहा।
” कब तक आयेंगे।”
” भाभी ने बोला कल आना।” उसने कहा।
मुझे हसी अा गई और उसके चेहरे पर मुस्कराहट। लगा जैसे हम एक दूसरे के एक दिन पहले की नकल कर रहे। वो साइकिल लेकर सड़क पर खड़ी हुई और मेरे मुड़कर बाहर आने का इंतजार करने लगी। जब मैं भी उसके पास आ गया तब वो चलने लगी और उसके साथ साथ मैं भी। मैंने सोचा मेरी वजह से उसकी जो बदनामी हुई थी दो साल पहले उसके लिए माफी मांगने का सही वक्त है। मगर तभी हमारे रास्ते अलग हो गए। उसने हाथ हिलाकर “बाय” कहा और मुड गई। मैं शब्द तलाशता रहा और वो फिर चली गई। पता नहीं था दोबारा ऐसा मौका कब आयेगा। कब मैं और वो अकेले होंगे। मैंने एक स्वर्णिम अवसर खो दिया था। मगर अब हम दोस्त थे……. शायद। उसने मेरा इंतजार किया, मुझसे बात की, और जाने से पहले “गुड बाय”। मुझे नहीं पता था ये बातें उसके साथ की हुई आखिरी बातें भी बन जायेंगी। धीरे धीरे इंटरमीडिएट परीक्षा अा गई और हम दूर हो गए। मगर कहानी यहां ख़तम नहीं हुई। मेरा दिल टूटना अभी बाकी था। कुछ महीनों बाद मैं अपने दोस्तों के साथ एक शादी में गया था। खा पीकर हम लोग कुर्सियों पर घेरा बनाए बैठे थे। इंडिया के वर्ल्डकप जीतने की बातें चल रही थी कि तभी मेरी नज़र संध्या पर पड़ी। नीले रंग का चमकदार सूट जैसा कुछ पहना था उसने। वो इतनी सुंदर लग रही थी कि हर कोई बस उसे ही देख रहा था। उसने मुझे देखा और देखकर बहुत हल्का सा मुस्कराई। तभी दोस्तों में से एक कि नजर उस पर पड़ी और वो बोला,” अरे देख भाभी जी अा गईं।”
दूसरे ने तुरंत बोला,” यही हैं वो कोचिंग वाली।”
संध्या ने सुन लिया और उसकी मुस्कराहट गायब हो गई। मैंने दोस्तों को हड़काया इस बात पर, मगर वो दूर चली गई। मैंने पूरे रिसोर्ट में उसे तलाश किया सोचा मैं माफी मांग कर आज बात शुरू करूंगा। तभी एक दोस्त ने बताया मुझे की वो दुल्हन के कमरे के पास वाले कमरे में गई है। मैं भागता हुआ उस कमरे तक गया। मैंने खिड़की से अंदर देखा एक लड़का उससे बात कर रहा था। संध्या ने उससे कुछ कहा और संध्या वहां से जाने लगी। उस लड़के ने संध्या का हाथ पकड़ लिया और उसको रोक लिया। मेरे पूरे शरीर में एक लहर सी दौड़ गई मेरे दोनों हाथ गुस्से में बंद हो गए और मैं दरवाजे की तरफ बढ़ा। मैंने सोचा मैं आज इस लड़के को जिंदा नहीं छोडूंगा। दरवाजा हल्का सा खुला था और मुझे सुनाई दिया,” सच सच बताओ मुझमें कोई प्रॉबलम है या तुम किसी से प्यार करती हो?”
इतना सुनते ही मेरे हाथ रुक गए। मैंने दरवाजा नहीं खोला और सुनने की कोशिश की।
संध्या ने कहा,” मेरी कुछ मजबूरियां हैं गोपाल। मैं किसी से प्यार नहीं कर सकती, मेरी जिंदगी ऐसी नहीं है कि मैं किसी से प्यार कर सकूं।”
गोपाल – ” लोग कहते हैं कोई विवेक नाम का लड़का है तुम्हारा बॉयफ्रेंड। क्या उसी की वजह से….?

संध्या – ” विवेक मेरा कुछ नहीं है, उसने तो आज तक कभी मुझसे बात भी नहीं की। तुम उसे जानते भी हो…?

गोपाल – ” मैंने उसको देखा नहीं है, बस तुम्हारे स्कूल की लड़कियों के मुंह से सुना है तुम्हारा विवेक के साथ…..”

संध्या – ” किसी और की बाते सुनकर तुम उस इंसान को बदनाम क्यों कर रहे हो जिसे जानते तक नहीं। तुम्हें पता है उसे कितनी प्रॉबलम होती होगी?”

गोपाल -” बदनामी केवल तुम्हारी हुई है विवेक की नहीं। और क्या पता उसने तुम्हें खुद ही बदनाम किया हो। “

संध्या – ” तभी तो मैं किसी से प्यार नहीं कर सकती। मुझे पढ़ाई करनी है, गवर्मेंट जॉब करनी है, मुझे अपने ऊपर लगे दाग मिटाने हैं। जो लोग मेरे और विवेक के बारे में गलत बोलते हैं उनका मुंह बंद करना है। तुममें कोई कमी नहीं है गोपाल, लेकिन मेरी जिंदगी में कोई लड़का नहीं आयेगा, सिर्फ और सिर्फ मेरा पति आयेगा। मैंने अपने आप से ये वादा किया है। “

मैं दरवाजा पकड़े खड़ा हुआ था और संध्या ने अंदर से दरवाजा खोला। संध्या ने मेरी आंखों में देखा और मैंने उसकी आंखो में। उसकी आंखों में आसूं थे जिनकी वजह मैं था। एक बार फिर बहुत कुछ कहना था लेकिन मैं ख़ामोश था। उसकी बाईं आंख से आंसू फिसलकर उसके गाल पर आया। मैं उसे देख रहा था और वो मुझे और ये आखिरी बार था जब हम दोनों एक दूसरे को देखते हुए ये भूल गए कि आसपास कोई और भी है। गोपाल ने पीछे से आवाज थी,” हेलो भाईसाहब, रास्ता छोड़ो उसे निकलना है।” और मैं दरवाजे से हट गया। वो निकलकर दूर जा रही थी। फिर से वो दूर जा रही थी और मैं फिर से इंतजार कर रहा था कि एक बार पलटकर देखो और बताओ कि तुम मुझसे प्यार करती हो। लेकिन वो गलियारे में चलती है रही थी। गोपाल मेरे पास आकर बोला,” यार हम लोग केवल बात कर रहे थे कमरे में, कुछ ग़लत मत सोचना।”
मैंने कुछ नहीं बोला मैं संध्या को दूर जाते देख रहा था। गोपाल के कुछ दोस्त उसके पास आकर बोले,” क्या हुआ? बात बनी? क्या बोली वो?”
गोपाल बोला ,” नहीं यार, वो इस टाइप की लड़की नहीं है।”

उसके दोस्तों ने पूछा,” ये लड़का कौन है? दोस्त है तेरा?”
मेरे कानों में सिर्फ आवाज आ रही थी मेरा ध्यान संध्या की तरफ था। मेरा दिल जोर जोर से कह रहा था,” संध्या मुझे माफ कर दो, तुम्हारी बदनामी का जिम्मेदार मैं हूं। बस एक बार पलटकर देखो और बताओ कि तुम मेरे लिए कुछ महसूस करती हो।”
वो पन्द्रह बीस कदम दूर जाकर रुकी और उसने मुझे देखा। आखिरकार उसने पलटकर मुझे देखा। अब उसके चेहरे पर सुकून दिख रहा था। वो समझ गई थी कि मैंने सब सुन लिया है। और वो गलती से अपने दिल की बात मुझसे कह चुकी थी। मैं उसकी तरफ़ देखकर मुस्कुराया, बदले में उसने भी भीगी आंखो से मुस्कुराकर दिखाया, और वो फिर से पलटकर चली गई। गोपाल के दोस्तों की आवाज़ मेरे कान में पड़ी,” क्या वो इसको देख रही थी।” मैं ने संध्या की तरफ से ध्यान हटाकर गोपाल की तरफ देखा। गोपाल और उसके दोस्त मेरी तरफ देख रहे थे। गोपाल ने पूछा, ” क्या आप संध्या को जानते हो?”
मैंने कहा,” नहीं, बस तुम दोनों की बातें सुनकर, थोड़ा बहुत जान पाया हूं।”

गोपाल ने पूछा,” आपका नाम?”
मैंने कहा, ” विवेक।”
और मैं दूसरी तरफ चला गया। मैं उसके लायक नहीं था वो मुझसे भी अच्छा लड़का पाने की हकदार है। मैं उस रात संध्या की आंख से गिरता हुआ आंसू बार बार याद कर रहा था।

आज भी हम दोनों कभी कभी रास्ते में एक दूसरे के सामने अा जाते हैं। एक दूसरे को देखकर हम दोनों को सुकून मिलता है। हम दोनों एक दूसरे को जी भर के देखते हैं। मेरे लिए यही हैप्पी एंडिंग है।

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