वो बदनाम सी लड़की ( Part 1 )

यह कहानी मेरे एक दोस्त से जुड़ी हुई हैं !
जिसे मैं कहानी का रूप दे रहा हूं !
उम्मीद है आपको पढ़ कर अच्छा लगेगा !

वो बहुत ज्यादा खूबसूरत लड़कियों में से नहीं थी, लेकिन उसकी आंखों का रंग धूप में बदल जाता था, बिल्कुल जैसे नागिन के आंखों का बदलता है। मैं उसका असली नाम नहीं लिख सकता क्योंकि शायद वो बदनाम सी लड़की कहीं और बदनाम ना हो जाए।

बात तब की है जब मैं जब हाई स्कूल में था और अच्छे नंबर पाने के लिए अगर आइंस्टीन से ट्यूशन लगवाना संभव होता तो मेरे मां बाप वो भी करवा सकते थे। मेरी शरारत और मेरी बेपरवाही से हर कोई परेशान था। सबको लगता था मैं भविष्य के प्रति गंभीर नहीं हूं। मेरी बड़ी बहन के स्कूल के एक टीचर ने मेरे घरवालों से वादा किया कि वे मुझ जैसे नालायक को ट्यूशन पढ़ा सकते हैं और सुधार भी सकते हैं। उनकी ये ख़ुश फहमी दूर करने मुझे उनके घर जाना पड़ा। वो टीचर केवल बेस्ट स्टूडेंट को ही पढ़ाते थे और दस से ज्यादा स्टूडेंट एक बार में कभी नहीं। मैं जब वहां पहुंचा तो देखा एक गोल घेरे में सात स्टूडेंट बैठे थे तीन लड़कियां और चार लड़के। जिसमें से एक लड़का मेरे स्कूल में पढ़ता था। और उन्हीं के बीच बैठे थे वो टीचर। उनकी उम्र तीस या पैंतीस साल की थी। उन्होंने जातिवाद की सीमाओं को लांघकर अपनी प्रेमिका से शादी की थी। ये बात मेरी बहन ने मुझे बताई थी। मेरे वहां पहुंचते ही उन्होंने मुझसे कहा,” आइए विवेक जी, शरारतों के सरदार।” उनके इतना बोलते ही हर कोई मेरी ओर देखने लगा। उन सात स्टूडेंट में से एक चेहरा मुझे देखकर चौंक गया था। ‘ संध्या ‘ मुझे देखकर हैरान थी। और मैं उसको देखकर अंदर ही अंदर थोड़ा खुश हुआ। हम दोनों को अपना अतीत याद अा गया था। मैं उस गोल घेरे में बैठ गया। और टीचर ने खाली पेपर पर कोई चीज समझाना शुरु किया। लेकिन मेरी नजर सामने संध्या की आंखों पर बार बार पड़ रही थी । कुछ देर में जब खिड़की से होती सूरज की रोशनी उसकी एक तरफ की आंख पर पड़ी , तो मैं ध्यान से उसको देखने लगा। और वो भी मेरी आंखों में देखने से अपने आप को रोक नहीं पा रही थी। मैं खो गया उस बीते पल में। अब से ठीक अठारह महीने पहले जब हम गणित के ट्यूशन में मिले थे। पहला दिन था ट्यूशन का और टीचर ने कुछ सवालों की बौछार कर दी थी ये जानने के लिए कि हमने इससे पहले कुछ पढ़ा है या नहीं। और सही जवाब देने वालों में सबसे आगे मैं और संध्या थे। पहले दिन ही हम दोनों ने एक दूसरे के अंदर एक जगह बना ली। और जब पहले दिन की कोचिंग ख़तम हुई, उसने हॉल से बाहर जाने से पहले मेरी तरफ देखा। मुझे उसी दिन पता चला कि वो उस स्कूल में पढ़ती है जो मेरे स्कूल का दुश्मन समझा जाता है। शहर में इन दोनों स्कूलों में होड़ लगी रहती थी कि किसका स्टूडेंट जिला टॉप करेगा। अगले दिन भी उसकी आंखें बार बार मेरी आंखों से टकरा रही थीं। उसके बाद तो जैसे हर रोज का यही सिलसला सा बन गया। मगर जब मैं कोई सवाल करता तो मेरी तरफ नहीं देखती थी, जब मैं टीचर से बात करता तब भी नहीं देखती। क्योंकि उस वक्त शायद हर कोई मुझे ही देखता था। लेकिन जब मैं अपने आप में खोया रहता तो वो मेरी तरफ देखती। मेरे दोस्तों ने मुझे कई बार बताया, की मुझे देखती रहती है। मुझे पता था लेकिन दोस्तों के सामने अनजान बनकर मैंने कहा,” मुझे कैसे पता चलेगा कि वो मुझे देखती है या नहीं?” दोस्तों ने कहा कि,” जैसे ही संध्या तुम्हें देखेगी हम लोग तुम्हारा नाम बोलेंगे।”

और अगले दिन मैं सवालों में उलझा हुआ था कि मेरे कानों में एक आवाज आती है,”विवेक।” मैंने तुरंत संध्या की तरफ देखा वो मुझे ही देख रही थी। अब मैं अपने आप पर गर्व महसूस कर रहा था। दोस्त मुझे झाड़ पर चढ़ाने में कोई कसर नहीं छोड़ते। और ऐसा कई बार हुआ, वो मेरी तरफ देखती मगर कोई इशारा नहीं कोई मुस्कराहट नहीं। बस मासूमियत से देखकर वापस अपने किताबों में खो जाती। धीरे धीरे ये खबर हर किसी को हो गई कि संध्या मुझे देखती है। तो संध्या की नजर मेरी तरफ जैसे ही आती थी, ट्यूशन में आवाजें गूंजने लगती मेरे नाम की। सबके मुंह से ,” विवेक – विवेक – विवेक ” नाम सुनाई देता। टीचर ने एक दिन मुझे इसी बात पर फटकार लगाई की सबकी जुबान पर मेरा नाम क्यों रहता है। मामला यहीं नहीं रुका, ये शिकायत मेरे घर तक पहुंच गई थी कि मैं किसी और को पढ़ाई नहीं करने देता हूं। किसी अज्ञात वजह से हर कोई मुझे पुकारता रहता है। संध्या समझ गई थी कि जब वो मेरी तरफ देखती है उसी वक्त सब लोग मेरा नाम लेते हैं। संध्या ने मेरी तरफ देखना बंद कर दिया। अब केवल दो ही बार वो मुझे देखती थी। जब वो हॉल में अंदर आती थी और कोचिंग ख़तम होने के बाद जब वो बाहर जाती। उसको देखते ही लड़कों के मुंह से मेरा नाम जोर से निकलना नियम हो गया था। वो मेरी कुछ नहीं लगती थी, फिर भी मेरे नाम से बदनाम हो रही थी। मगर ऐसा ज्यादा दिन नहीं चला। एक दिन वो ट्यूशन पढ़ने नहीं आई। मैंने पहली बार महसूस किया कि उसके बिना ये जगह कितनी अधूरी है। शायद उसके बिना मैं अधूरा हूं। उसके बाद लगातार एक हफ्ते तक मुझे वो दिखाई नहीं दी। जब तक मैं अपने अंदर उसकी कमी महसूस कर पाया तब तक देर हो चुकी थी। मुझे बस इतना पता चला संध्या ट्यूशन छोड़ कर किसी और कोचिंग सेंटर चली गई थी। मैंने एक दिन हिम्मत करके उसके साथ आने वाली लड़की से पूछा की संध्या कहां चली गई। उस लड़की ने मुझे संध्या के बारे में बताने से मना कर दिया। उसने ये भी कहा,” संध्या तुम्हारी वजह से पढ़ाई पर ध्यान नहीं दे पा रही थी। और वो रास्ते में या बाजार में कहीं भी निकलती थी तो कोई ना कोई उसकी तरफ देखकर तुम्हारा नाम जोर से बोलता था। इसलिए वो तुमसे दूर गई है।”
उसके बाद आज वो मेरे सामने अाई थी। शायद उसको भी मुझे देखकर खुशी हुई थी तभी तो इतनी देर से मेरी आंखों में देख रही थी। और वो भी शायद मेरी आंखों में अपनी कमी महसूस कर रही थी जैसा मैं उसकी आंखों में देख रहा था। लेकिन इतनी देर तक किसी की आंखों में नहीं देखना चाहिए इसलिए मैंने बीती यादों से बाहर आकर टीचर की तरफ ध्यान लगाया जो की मुस्करा रहे थे, और कागज पर प्रकाश किरणों के चित्र बनाकर कुछ समझा रहे थे। उन्होंने एक अजीब सा सवाल किया,” क्या किसी और ने वो देखा जो मैंने देखा?”

नदीम नाम का लड़का बोला,” सर मैंने भी देखा।”
टीचर ने मेरी तरफ देखकर कहा,” सड़क पर चलते हुए अगर ध्यान भटक गया तो ऐक्सिडेंट हो सकता है, विवेक जी इसलिए ध्यान सही जगह लगाओ?”

मेरे दिल की धड़कन सौ के पार पहुंच गई और मैं अनजान बनकर घबराहट में पूछ बैठा,” क्या मतलब सर, मैं समझ नहीं पाया।”

टीचर ने संध्या की तरफ देखकर कहा,” जिसे समझना चाहिए वो समझ गया, किसी को देखो मगर उसको पता ना चले तुम उसे देख रहे हो।”

संध्या की नजर नीचे झुक गई, दूसरे लोगों के लिए ये हसने की बात थी लेकिन मुझे पता था वो अंदर से क्या सोच रही है। जिस बदनामी से बचने के लिए अठारह महीने पहले वो दूर हुई थी वो बदनामी इतने महीने बाद आकर फिर से उसे पास अा गई। मुझे फिर से डर था कि वो यहां से पढ़ाई छोड़कर कहीं और ना चली जाए, मगर उसने ऐसा नहीं किया, क्योंकि दो महीने बाद ही बोर्ड परीक्षा थी। टीचर ने मुझे पढ़ाई के बाद में रोका और सबके जाने के बाद पूछा भी कि मेरा उससे क्या रिश्ता है, हम दोनों एक दूसरे को क्यों देख रहे थे। मैंने उनसे केवल इतना कहा कि हम पहले गणित के ट्यूशन में साथ पढ़ते थे। लेकिन मेरी बात पर यकीन करना उनके लिए मुश्किल था। और एक दूसरे से निगाहें ना मिलाना हमारे लिए मुश्किल था। निगाहें अपने आप एक दूसरे की तरफ खींची चली जाती थीं। और फिर से बदनामी का वो दौर शुरू हो गया, उसका नाम मेरे नाम के साथ जुड़ गया। हम जैसे ही एक दूसरे को देखते कोई ना कोई फुसफुसाकर गाना गाने लगता ” दो दिल मिल रहे हैं, मगर….चुपके चुपके।” ये खबर मेरे स्कूल वाले दोस्तों तक पहुंच गई कि कोई संध्या नाम की लड़की है जो विवेक की गर्लफ्रेंड है। मुझे बहुत दफा टीचर ने समझाया कि लड़की की बदनामी हो रही है, मेरी वजह से। लेकिन मैं क्या करता मुझे खुद नहीं पता था। शायद मुझे प्यार हो गया था उस बदनाम सी लड़की से। क्या मुझे उससे कहना चाहिए कि मैं उससे प्यार करता हूं। क्या हम दोनों एक साथ हो जायेंगे तो तो बदनाम होने से बच जाएगी। यही सवाल मन में चलते रहे और वक्त निकल गया। हाई स्कूल की परीक्षा अा गई। और ट्यूशन का आखिरी दिन भी अा गया। मैं उससे बात करना चाहता था लेकिन हर किसी की आंखें हम दोनों को देखती रहती थी हर वक्त इसलिए मैं कुछ नहीं कह पाया। बस आखिरी बार उसको जी भर के देखता रहा। मैं जानता था अब शायद हम दोबारा नहीं मिलेंगे शायद ये आखिरी मुलाकात है। मुझसे बदनामी के अलवा और कुछ नहीं मिला उसे। शायद वो किसी दूसरे शहर में जाएगी। वो फिल्मों में होता है ना कि जाते जाते दूर जाकर एक बार हीरोइन पलटकर देखती है, मैंने सोचा अभी ऐसा मेरे साथ भी होगा। लेकिन उसने नहीं देखा। आखिर क्यों देखती, बदनामी के सिवा और कुछ देने की हिम्मत कहां थी मुझमें। एक दिल ये भी कहता है कि उसकी आंखों में आसूं थे जिन्हें वो दिखाना नहीं चाहती थी इसलिए नहीं पलटकर देख पाई। लेकिन अगर वो देखती तो शायद मैं उसके स्कूल के बाहर उसका इंतजार करने जाता, और वहीं दिल की बात कहता लेकिन अब नहीं। अब दिल टूट सा गया था।

उस देखना चाहिए था !

इसके आगे की कहानी अगले भाग में ।

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