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Nilesh shayri.

 

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Nilesh kumar

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वो बदनाम सी लड़की ( Part 1 )

यह कहानी मेरे एक दोस्त से जुड़ी हुई हैं !
जिसे मैं कहानी का रूप दे रहा हूं !
उम्मीद है आपको पढ़ कर अच्छा लगेगा !

वो बहुत ज्यादा खूबसूरत लड़कियों में से नहीं थी, लेकिन उसकी आंखों का रंग धूप में बदल जाता था, बिल्कुल जैसे नागिन के आंखों का बदलता है। मैं उसका असली नाम नहीं लिख सकता क्योंकि शायद वो बदनाम सी लड़की कहीं और बदनाम ना हो जाए।

बात तब की है जब मैं जब हाई स्कूल में था और अच्छे नंबर पाने के लिए अगर आइंस्टीन से ट्यूशन लगवाना संभव होता तो मेरे मां बाप वो भी करवा सकते थे। मेरी शरारत और मेरी बेपरवाही से हर कोई परेशान था। सबको लगता था मैं भविष्य के प्रति गंभीर नहीं हूं। मेरी बड़ी बहन के स्कूल के एक टीचर ने मेरे घरवालों से वादा किया कि वे मुझ जैसे नालायक को ट्यूशन पढ़ा सकते हैं और सुधार भी सकते हैं। उनकी ये ख़ुश फहमी दूर करने मुझे उनके घर जाना पड़ा। वो टीचर केवल बेस्ट स्टूडेंट को ही पढ़ाते थे और दस से ज्यादा स्टूडेंट एक बार में कभी नहीं। मैं जब वहां पहुंचा तो देखा एक गोल घेरे में सात स्टूडेंट बैठे थे तीन लड़कियां और चार लड़के। जिसमें से एक लड़का मेरे स्कूल में पढ़ता था। और उन्हीं के बीच बैठे थे वो टीचर। उनकी उम्र तीस या पैंतीस साल की थी। उन्होंने जातिवाद की सीमाओं को लांघकर अपनी प्रेमिका से शादी की थी। ये बात मेरी बहन ने मुझे बताई थी। मेरे वहां पहुंचते ही उन्होंने मुझसे कहा,” आइए विवेक जी, शरारतों के सरदार।” उनके इतना बोलते ही हर कोई मेरी ओर देखने लगा। उन सात स्टूडेंट में से एक चेहरा मुझे देखकर चौंक गया था। ‘ संध्या ‘ मुझे देखकर हैरान थी। और मैं उसको देखकर अंदर ही अंदर थोड़ा खुश हुआ। हम दोनों को अपना अतीत याद अा गया था। मैं उस गोल घेरे में बैठ गया। और टीचर ने खाली पेपर पर कोई चीज समझाना शुरु किया। लेकिन मेरी नजर सामने संध्या की आंखों पर बार बार पड़ रही थी । कुछ देर में जब खिड़की से होती सूरज की रोशनी उसकी एक तरफ की आंख पर पड़ी , तो मैं ध्यान से उसको देखने लगा। और वो भी मेरी आंखों में देखने से अपने आप को रोक नहीं पा रही थी। मैं खो गया उस बीते पल में। अब से ठीक अठारह महीने पहले जब हम गणित के ट्यूशन में मिले थे। पहला दिन था ट्यूशन का और टीचर ने कुछ सवालों की बौछार कर दी थी ये जानने के लिए कि हमने इससे पहले कुछ पढ़ा है या नहीं। और सही जवाब देने वालों में सबसे आगे मैं और संध्या थे। पहले दिन ही हम दोनों ने एक दूसरे के अंदर एक जगह बना ली। और जब पहले दिन की कोचिंग ख़तम हुई, उसने हॉल से बाहर जाने से पहले मेरी तरफ देखा। मुझे उसी दिन पता चला कि वो उस स्कूल में पढ़ती है जो मेरे स्कूल का दुश्मन समझा जाता है। शहर में इन दोनों स्कूलों में होड़ लगी रहती थी कि किसका स्टूडेंट जिला टॉप करेगा। अगले दिन भी उसकी आंखें बार बार मेरी आंखों से टकरा रही थीं। उसके बाद तो जैसे हर रोज का यही सिलसला सा बन गया। मगर जब मैं कोई सवाल करता तो मेरी तरफ नहीं देखती थी, जब मैं टीचर से बात करता तब भी नहीं देखती। क्योंकि उस वक्त शायद हर कोई मुझे ही देखता था। लेकिन जब मैं अपने आप में खोया रहता तो वो मेरी तरफ देखती। मेरे दोस्तों ने मुझे कई बार बताया, की मुझे देखती रहती है। मुझे पता था लेकिन दोस्तों के सामने अनजान बनकर मैंने कहा,” मुझे कैसे पता चलेगा कि वो मुझे देखती है या नहीं?” दोस्तों ने कहा कि,” जैसे ही संध्या तुम्हें देखेगी हम लोग तुम्हारा नाम बोलेंगे।”

और अगले दिन मैं सवालों में उलझा हुआ था कि मेरे कानों में एक आवाज आती है,”विवेक।” मैंने तुरंत संध्या की तरफ देखा वो मुझे ही देख रही थी। अब मैं अपने आप पर गर्व महसूस कर रहा था। दोस्त मुझे झाड़ पर चढ़ाने में कोई कसर नहीं छोड़ते। और ऐसा कई बार हुआ, वो मेरी तरफ देखती मगर कोई इशारा नहीं कोई मुस्कराहट नहीं। बस मासूमियत से देखकर वापस अपने किताबों में खो जाती। धीरे धीरे ये खबर हर किसी को हो गई कि संध्या मुझे देखती है। तो संध्या की नजर मेरी तरफ जैसे ही आती थी, ट्यूशन में आवाजें गूंजने लगती मेरे नाम की। सबके मुंह से ,” विवेक – विवेक – विवेक ” नाम सुनाई देता। टीचर ने एक दिन मुझे इसी बात पर फटकार लगाई की सबकी जुबान पर मेरा नाम क्यों रहता है। मामला यहीं नहीं रुका, ये शिकायत मेरे घर तक पहुंच गई थी कि मैं किसी और को पढ़ाई नहीं करने देता हूं। किसी अज्ञात वजह से हर कोई मुझे पुकारता रहता है। संध्या समझ गई थी कि जब वो मेरी तरफ देखती है उसी वक्त सब लोग मेरा नाम लेते हैं। संध्या ने मेरी तरफ देखना बंद कर दिया। अब केवल दो ही बार वो मुझे देखती थी। जब वो हॉल में अंदर आती थी और कोचिंग ख़तम होने के बाद जब वो बाहर जाती। उसको देखते ही लड़कों के मुंह से मेरा नाम जोर से निकलना नियम हो गया था। वो मेरी कुछ नहीं लगती थी, फिर भी मेरे नाम से बदनाम हो रही थी। मगर ऐसा ज्यादा दिन नहीं चला। एक दिन वो ट्यूशन पढ़ने नहीं आई। मैंने पहली बार महसूस किया कि उसके बिना ये जगह कितनी अधूरी है। शायद उसके बिना मैं अधूरा हूं। उसके बाद लगातार एक हफ्ते तक मुझे वो दिखाई नहीं दी। जब तक मैं अपने अंदर उसकी कमी महसूस कर पाया तब तक देर हो चुकी थी। मुझे बस इतना पता चला संध्या ट्यूशन छोड़ कर किसी और कोचिंग सेंटर चली गई थी। मैंने एक दिन हिम्मत करके उसके साथ आने वाली लड़की से पूछा की संध्या कहां चली गई। उस लड़की ने मुझे संध्या के बारे में बताने से मना कर दिया। उसने ये भी कहा,” संध्या तुम्हारी वजह से पढ़ाई पर ध्यान नहीं दे पा रही थी। और वो रास्ते में या बाजार में कहीं भी निकलती थी तो कोई ना कोई उसकी तरफ देखकर तुम्हारा नाम जोर से बोलता था। इसलिए वो तुमसे दूर गई है।”
उसके बाद आज वो मेरे सामने अाई थी। शायद उसको भी मुझे देखकर खुशी हुई थी तभी तो इतनी देर से मेरी आंखों में देख रही थी। और वो भी शायद मेरी आंखों में अपनी कमी महसूस कर रही थी जैसा मैं उसकी आंखों में देख रहा था। लेकिन इतनी देर तक किसी की आंखों में नहीं देखना चाहिए इसलिए मैंने बीती यादों से बाहर आकर टीचर की तरफ ध्यान लगाया जो की मुस्करा रहे थे, और कागज पर प्रकाश किरणों के चित्र बनाकर कुछ समझा रहे थे। उन्होंने एक अजीब सा सवाल किया,” क्या किसी और ने वो देखा जो मैंने देखा?”

नदीम नाम का लड़का बोला,” सर मैंने भी देखा।”
टीचर ने मेरी तरफ देखकर कहा,” सड़क पर चलते हुए अगर ध्यान भटक गया तो ऐक्सिडेंट हो सकता है, विवेक जी इसलिए ध्यान सही जगह लगाओ?”

मेरे दिल की धड़कन सौ के पार पहुंच गई और मैं अनजान बनकर घबराहट में पूछ बैठा,” क्या मतलब सर, मैं समझ नहीं पाया।”

टीचर ने संध्या की तरफ देखकर कहा,” जिसे समझना चाहिए वो समझ गया, किसी को देखो मगर उसको पता ना चले तुम उसे देख रहे हो।”

संध्या की नजर नीचे झुक गई, दूसरे लोगों के लिए ये हसने की बात थी लेकिन मुझे पता था वो अंदर से क्या सोच रही है। जिस बदनामी से बचने के लिए अठारह महीने पहले वो दूर हुई थी वो बदनामी इतने महीने बाद आकर फिर से उसे पास अा गई। मुझे फिर से डर था कि वो यहां से पढ़ाई छोड़कर कहीं और ना चली जाए, मगर उसने ऐसा नहीं किया, क्योंकि दो महीने बाद ही बोर्ड परीक्षा थी। टीचर ने मुझे पढ़ाई के बाद में रोका और सबके जाने के बाद पूछा भी कि मेरा उससे क्या रिश्ता है, हम दोनों एक दूसरे को क्यों देख रहे थे। मैंने उनसे केवल इतना कहा कि हम पहले गणित के ट्यूशन में साथ पढ़ते थे। लेकिन मेरी बात पर यकीन करना उनके लिए मुश्किल था। और एक दूसरे से निगाहें ना मिलाना हमारे लिए मुश्किल था। निगाहें अपने आप एक दूसरे की तरफ खींची चली जाती थीं। और फिर से बदनामी का वो दौर शुरू हो गया, उसका नाम मेरे नाम के साथ जुड़ गया। हम जैसे ही एक दूसरे को देखते कोई ना कोई फुसफुसाकर गाना गाने लगता ” दो दिल मिल रहे हैं, मगर….चुपके चुपके।” ये खबर मेरे स्कूल वाले दोस्तों तक पहुंच गई कि कोई संध्या नाम की लड़की है जो विवेक की गर्लफ्रेंड है। मुझे बहुत दफा टीचर ने समझाया कि लड़की की बदनामी हो रही है, मेरी वजह से। लेकिन मैं क्या करता मुझे खुद नहीं पता था। शायद मुझे प्यार हो गया था उस बदनाम सी लड़की से। क्या मुझे उससे कहना चाहिए कि मैं उससे प्यार करता हूं। क्या हम दोनों एक साथ हो जायेंगे तो तो बदनाम होने से बच जाएगी। यही सवाल मन में चलते रहे और वक्त निकल गया। हाई स्कूल की परीक्षा अा गई। और ट्यूशन का आखिरी दिन भी अा गया। मैं उससे बात करना चाहता था लेकिन हर किसी की आंखें हम दोनों को देखती रहती थी हर वक्त इसलिए मैं कुछ नहीं कह पाया। बस आखिरी बार उसको जी भर के देखता रहा। मैं जानता था अब शायद हम दोबारा नहीं मिलेंगे शायद ये आखिरी मुलाकात है। मुझसे बदनामी के अलवा और कुछ नहीं मिला उसे। शायद वो किसी दूसरे शहर में जाएगी। वो फिल्मों में होता है ना कि जाते जाते दूर जाकर एक बार हीरोइन पलटकर देखती है, मैंने सोचा अभी ऐसा मेरे साथ भी होगा। लेकिन उसने नहीं देखा। आखिर क्यों देखती, बदनामी के सिवा और कुछ देने की हिम्मत कहां थी मुझमें। एक दिल ये भी कहता है कि उसकी आंखों में आसूं थे जिन्हें वो दिखाना नहीं चाहती थी इसलिए नहीं पलटकर देख पाई। लेकिन अगर वो देखती तो शायद मैं उसके स्कूल के बाहर उसका इंतजार करने जाता, और वहीं दिल की बात कहता लेकिन अब नहीं। अब दिल टूट सा गया था।

उस देखना चाहिए था !

इसके आगे की कहानी अगले भाग में ।

वोह मेरी दोस्ती में है पूनम का चाँद

मेरी एक मित्र है नाम है अनीता

वोह मेरी दोस्ती मैं है जैसे चन्द्रबिन्दु।

मुझे उससे पहली मुलाकात भी है अच्छी तरह याद,
जेठ की थी चिलचिलाती धुप दिन था इतवार ,
और तारीख था तेइस अप्रेल सन दो हज़ार दस ।

उसकी हर बाते मुझे लगाती है प्यारी , क्योंकि वोह है सबसे न्यारी।

मेरी बातो को समझाने वाली, सीधी सादी भोली भली थोड़ी सुकुमारी।

चाल पर उसकी मैं सड़के जाता हूँ , जब वोह चलती है मैं ठहर जाता हूँ।

सूना था मोरनी की चाल बहुत प्यारी होती है,
अब मैं मानता हूँ वोह ज़रूर अनीता जैसी चलती है।

आवाज़ में है उसके एक मिठास , लगता है जैसे गन्ने का खेत हो आस पास।

कानो में जो शहद सी घुलती है और सीधे दिल पर असर कराती है।

मेरेजज्बातों को वो झंझोरती है , मुझमे नित नयी जीवन की आस है।

मेरी रचनाओ में पलती है , मेरे गीतों और कविताओ में वो मिलाती है।

मुझे कुछ नया करने की वो प्रेरणा देती है, मेरी हर काम की वो सुध लेती है।

मुझे उसकी दोस्ती पर है नाज़, न था उसपर ग्रहण न है उसपर दाग।

वोह मेरी दोस्ती में है पूनम का चाँद , वोह मेरी दोस्ती में है पूनम का चाँद।

Nilesh

Love Story.. प्रेम कहानी

आज ही मैंने इस कहानी को पढ़ा और अपने आप को रोक नहीं पाया आपलोगों के साथ बांटने में।
कहानी इस प्रकार है :-

एक लड़का एक लड़की को मन ही मन में चाहता था। कुछ समय के इंतज़ार के पश्च्यात उसने एक दिन उस लड़की को अपने मन की बात बताई कि वह उसे बहुत चाहता और प्यार करता है।
लड़की ने कोई जवाव नहीं दिया और चली गयी। उसने मन ही मन सोचा “देखू यह कैसा प्यार है मैं इसका इम्तहान लेती हूँ”

परिणामस्वरुप शुरुआत हुई उस लडके को कष्ट देने की। कभी तीखी बाते कह कर , कभी उसके साथ दुर्व्यवहार करके , तो कभी अवहेलना करके जब जैसी इच्छा हुयी उसने उसे तकलीफ़ पहुचाई फिर भी अंत में उसने देखा लड़का उसे अब भी चाहता है। तब उसने सोचा “यह लडका सच में उसे चाहता है और प्यार करता है” किन्तु इसके बाद भी अनजाने में उसके मन में अहंकार जाग उठा उसने सोचा ऐसे कितने ही लडके उसे चाहते होंगे उसके लिए पागल होगे क्या जरुरत है यह सब झमेला लेने की सिर्फ एक व्यक्ति के साथ रही तो बाकियों का मन कौन बहलायेगा?

इधर दुनिया वालो से दूर प्रेम की आग में भीतर ही भीतर जलता और कष्ट पाता वो लड़का लगभग शेष हो गया। इसके पश्च्यात बहुत दिन गुज़र गए। इस बीच उस लड़की के पास अनेको लड़को के प्रसताव आये परन्तु उसने देखा उस एक लडके के प्यार के साथ किसी की तुलना नहीं हो सकती। इसबार लड़की ने एक कागज़ पर बहुत ही सुन्दर तरीके से लिखा “कोई अगर बहुत आसानी से सच्चा प्यार पा जाये तो वो उसका सही मूल्यांकन नहीं कर सकता।तुम्हे कष्ट देकर मैंने तुम्हे यह समझाया है।अब समय आ गया है कि तुम्हे उसका फल मिले। मैं तुम्हारा आज अपने जीवन में स्वागत करती हूँ!”

लड़की उस लडके को ढूढते ढूढते उसके घर पहुंची। धक्का देते ही दरवाजा खुल गया।घर सन्नाटे और नीरव में डुबा हुआ था। आहिस्ता आहिस्ता वो आगे बढ़ी।किसी तरह की कोई शब्द नहीं। कुछ आगे जाने के पश्च्यात उसने देखा लड़का एक टेबल पर सर झुकाए बैठा है।प्यार से मुस्कुरा कर उसने लडके को पीछे से पकडा। और कुछ समझने के पहले ही लडके का निर्जीव शरीर धरती पर गिर पडा! कलाई पर जमा हुआ रक्त साफ़ बता रहा था लड़का अब नहीं रहा लड़की समझ नहीं पा रही थी वह क्या करे तभी पास में उसे एक नीला लिफाफा पड़ा दिखाई दिया। लिफाफे से एक कागज़ का टुकड़ा निकला। कागज़ पर लिखा था “कोई अगर बहुत आसानी से सच्चा प्यार पा जाये तो वोह उसका सही मूल्यांकन नहीं कर सकता।बड़ी आसानी से अपने प्यार का इज़हार कर तुम्हारे दिए हुए कष्ट से अनजाने में ही अपने आप, मैं ध्वंग्स हो गया।अब समय आ गया है कि तुम्हे उसका फल मिले।आज मैं तुमसे विदा ले रहा हूँ !

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वो बस वाली लड़की

बस का सफ़र बड़ा ही मजेदार होता है। हाँ हर बार तो नहीं पर कभी कभी इतना की वो हमारे दिलो-दिमाग पर एक अमिट छाप छोड़ देता है। हा मुझे कुछ ज्यादा पसंद नहीं है , बस में यात्रा करना !

एक ऐसी ही बस यात्रा मेरी भी थी। मै अपने शहर से पातेपुर जा रहा था। मेरी ट्रैनिंग चल रही थी | मै जल्दी से बस-अड्डे की तरफ भागा। माँ के तिलक करने और दही-चीनी खिलाने की रस्म निभाने में मुझे पहले ही देर हो चुकी थी। अब हमारी माँ हमारी इतनी परवाह जो करती है, अपने बेटे को ऐसे कैसे जाने दे देती। जैसे तैसे मै बस-अड्डे पहुंचा। देखा तो एक बस कड़ी थी और कंडक्टर अपनी फटी आवाज़ में पातेपुर पातेपुर चिल्ला रहा था। खैर मै टिकट लेकर बस के अन्दर पहुंचा। एक ही सीट खाली थी, वो भी एक सुन्दर सी कन्या के साथ वाली। देख के मन गद-गद हो उठा, फिर भी अपनी ख़ुशी को दबाते हुए मै अपना सामान ऊपर टिका कर खुद सीट पर टिक गया। मन में एक दबी से मुस्कराहट उच्छालें मार रही थी। उसका ध्यान तो बस खिड़की के बाहर कपडे के दूकान में टंगे एक पर्स पर था। बहुत मिन्नतें करने के बाद बस को आगे बढाने का कार्यक्रम सुरु हुआ। बस अपना पूरा जोर लगाते हुए,चीखते-चिल्लाते हुए आगे बढ़ने लगी। कुछ दूर बस चली ही थी की उसे रुकना पड़ा। कुछ अतरंगी से लोग ऊपर चढ़े। सामने ही आ के खड़े हो गये। मुझे क्या लेना था मेरी निगाह तो उसके चेहरे के दर्शन करने को लालायित थी। उसका ध्यान मेरी तरफ गया, शुक्र है खुदा का। मैंने अपने अन्दर की सारी ताकत झोकते हुए उस से पूछे “आप भी पातेपुर जा रहे हो?”। उसने हाँ में सर हिलाया। मेरे अन्दर की हिम्मत बढ़ी, मैंने पूछा “आप का नाम क्या है?। उसने मुझपर एहसान जताते हुए कहा “रेखा”। बातों का सिलसिला चलता रहा, बस भी चलती रही। इसी बीच एक स्टॉप आ गया, मेरे बगल की सीट खाली हुई। चार पूर्ण रूप से थके-हारे लोग ऊपर आये। मेरे बगल की सीट पे बिराजमान हो गये। पर उन्हें सारी सीटें साथ में चाहिए थी सो कंडक्टर ने आ के हम दोनों से गंभीर रूप से कहा” भैया आप दोनों पीछे चले जाइए न, चूँकि इनकी तबियत खराब है तो इन्हें साथ में बैठना है”। बीमारी की बात सुन हम तरस खा के पीछे चले गए। बस एक बार फिर आगे बढ़ी। हमारी बातो का सिलसिला भी बढ़ता गया। हमारी अच्छी-खासी दोस्ती हो गयी थी। मैंने सोचा चलो एक दोस्त बन गया। ठंडी हवाओं के कारण उसे नींद आने लगी, वो हमारे कन्धों पर ही सर रख के सो गयी। एक बार फिर से मन में लड्डू फुटा। अभी उसका सर हमारे कन्धों पर अच्छे से पहुंचा भी नहीं था की एक बार फिर से बस रुकी, कुछ मरियल से लोग फिर नज़र आने लगे। हरकतों से मुझे अंदाज़ा हो गया की ये भी बीमार आदमी पार्टी की सदस्य हैं। एक बार फिर से कंडक्टर का निशाना हम बने। इस बार हमसे हमारी सखी के साथ बिलकुल पीछे जाने की गुजारिश की गयी। झल्ला के हमने चिल्ला के बोला “अरे भाई बस चला रहे हो की एम्बुलेंस। कहाँ से इतने सारे बीमारों को पकड़ लाये हो”। लड़की के कहने पे हम शांत हो के पीछे चले गए। हमारी बाते फिर से आगे बढ़ी हमने पूछा “फेसबुक यूज़ करती हो” उसने कहा “हाँ”। हमने फटाफट फ़ोन निकाल के उसको फ्रेंड-रिक्वेस्ट भेजा। उसने भी उसी गति से उसे स्वीकार किया। हमलोग पातेपुर पहुँचने वाले थे। हमने सोचा की अब फेसबुक के भरोसे बैठे तो नहीं रह सकते ना, सो क्यों न उस से उसका फ़ोन-नंबर लिया जाए। हमने अपने अन्दर की समूची ताकत झोंक के उस से उसका नंबर मांगने की हिमाकत भी कर डाली। उसने धीरे से हमारी तरफ अपना चेहरा घुमाया, अपनी आँखों को मेरी आँखों के अन्दर झांकते हुए बिन बोले ही ऐसे भाव जताए जैसे मैंने उस से उसका नंबर नहीं उसकी दोनों किडनियां मांग ली हो। उसी क्षण हमें हमें अहसास हुआ की कैसे एक औरत दुर्गा और काली का रूप लेती होंगी। मैंने धीरे से अपना सर दूसरी तरफ घुमाया और उधार ही छोड़ दिया। उसने फिर कंधे पे थपथपाया और अपना फ़ोन मेरे हाथ में देते हुए कहा इस से अपने नंबर पे फ़ोन कर लो। एक पल को ऐसा लगा जैसा वो अपना नंबर नहीं बिल गेट्स की सारी सम्पति मेरे नाम कर रही हो। मैंने उसके फ़ोन से खुद को ही फ़ोन किया, धीरे धीरे चीखता हुआ मेरे मोबाइल गाने लगा “कैसे मुझे तुम मिल गयी, किस्मत पे आये न यकीं”। मैंने फ़ोन कटा और उसका नाम अपने फ़ोन में “बस वाली” के नाम से सेव कर लिया।धीरे धीरे बस चरमराते हुए बस रुकी। सभी धीरे-धीरे उतरे। मै भी उतर के अपने घर को जाने लगा की उसें पीछे से आवाज लगायी ”फ़ोन करते रहना’। मैंने हाँ में सर हिलाया और आगे बढ़ता चला गया। बस इतनी से थी मेरी बस की यात्रा।

#nilesh

तुम क्या गयीं सारी खुशियाँ चली गयीं,

तुम क्या गयीं सारी खुशियाँ चली गयीं,
मन तो उदास होता आज भी है।

आँखों में आँशू दिखते नहीं ये और बात है,
पर तेरी याद में हर पल ये दिल रोता आज भी है।

साथ बिताये थे बैठकर जो लम्हे ,हमने, कभी एक साथ
धुंधली पड़ गयी उन यादों को ,
आंसुओं से धोता ये दिल आज भी है।

चांदनी रातों में झील के किनारे बैठकर ,
सुनी थी हमने ,तेरी चूड़ियों की खनखनाहट।

तेरी पायलों की छनक से निकले हुए उस राग को ,
सूखे होठों से हरपल गुनगुनाता ये दिल आज भी है।

किसी जहरीली नागिन सा बलखाता तेरा बदन ,और,
मदमस्त तेरे होठों से पिया था ,हमने कभी तेरा जहर।

नीलिमा नही आती मेरे बदन पर कभी फिर भी,
तेरे जहर के नशे में ये दिल ,झूम जाता आज भी है।

अरे ! तुम तो चले गए और जाते हुए मुझको,
क्यों इस शराब का सहारा दे गए ।

जब पीता हूँ इस गरज से कि पिऊंगा ,रात भर ,
और कोसुंगा तेरे इश्क़ को।

बस देख कर तेरी तस्वीर को न जाने क्यों,
हर बार मेरे हाथ से पैमाना, छूट जाता आज भी है।।

#Nilesh

जब से इन आँखों ने , देखा है तुम्हे।

जब से इन आँखों ने ,

देखा है तुम्हे।

आँखों में तुम,

सांसो में तुम,

बातो में तुम,

तुम ही तुम रहती हो।

रहने लगी हो तुम।

मेरे ख्यालो में,

मेरे जज्बातों में,

मेरे कामो में,

तुम ही तुम रहती हो।

रहने लगी हो तुम,

मन में ,

तन में,

आत्मा में,

तुम ही तुम रहती हो।

रहने लगी हो तुम।

मेरे एहसास में,

मेरी प्यास में,

मेरे इंतज़ार में,

तुम ही तुम रहती हो।

रहने लगी हो तुम।

मेरी चाहत में,

मेरी दुआओ में,

पर तुम्हे पता नही।

जब से इन आँखों ने ,

देखा है तुम्हे।

तुम ही तुम रहती हो।

सरदार वल्लभ भाई पटेल

‘साम दाम , दण्ड भेद’ की नीति अपनाई,
भारत को संगठित कर, सच्ची देशभक्ति
निभाई
व्यर्थ न होने दिया महान् बलिदानों को,
सही समझा अंग्रेजो की कूटनीतियों को ,
आज आपकी जन्म जयंती मनाएं हम ,
काश कि फिर सितारे हों बुलंद,
काश कि फिर एक ओर सरदार वल्लभ भाई पटेल
पाएं हम !

#Nilesh